Friday, 13 September 2013

रूपवती अयस्लु

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"मेरे पास सिर्फ एक हजार अशर्फियाँ हैं" युवक ने दुःख भरे स्वर में कहा, "मुझ पर दया करो, कंघी मुझे इतने पैसों में बेच दो, क्योंकि मेरी किस्मत इसी से खुलेगी ।"

"ठीक है" बूढ़े ने कहा "कंघी एक हजार अशर्फियों में ले लो, अगर इसके साथ अपने गोश्त का एक टुकड़ा भी देने को तैयार हो ।"

अब युवक समझ गया की उसके सामने सौदागर नहीं, बल्कि एक दुष्ट नरभक्षी है, लेकिन वह न हिचकिचाया और न ही पीछे हटा । उसने चुपचाप अपनी जेब से सारी रकम उलट दी और फिर मोज़े में से छुरा निकाल, अपने सीने से मांस का टुकड़ा काट कर उसे मूल्य चुका दिया । कंघी उसकी अपनी हो गयी ।

ठीक तीस दिन बाद भाई फिर तिराहे पर मिल गये । उन्होंने एक दूसरे को कसकर गले लगा लिया, एक दूसरे की तबियत पूछी और अपनी-अपनी खरीदी हुई वस्तुओं की तारीफ करने लगे ।

"आखिर किसका उपहार अयस्लु को पसंद आएगा ?" तीनों मन में सोच रहे थे । "दर्पण, कालीन और कंघी तीनों ही एक से एक बढकर हैं ।"

रात बातों में बीत गयी,जब सुबह हुई तो भाइयों की यह जानने  की इच्छा जाग उठी कि दुनिया में क्या हो रहा है, और उन्होंने शीशे में देखा।

सारी दुनिया उनकी आंखों के सामने घूम गयी और खान की राजधानी भी दिखाई दी । लेकिन यह क्या ? महल के आस-पास के रास्ते शोकमगन  भीड़ से भरे थे । वहां किसी को दफनाया जा रहा था मृत को भव्य ताबूत में कंधों पर उठाकर ले जाया जा रहा था, और उसके पीछे-पीछे आंसू बहाता हुआ खान चल रहा था । तीनों भाई सब समझकर सिहर उठे, रूपवती अयस्लु मर गयी ।

मझले भाई ने तुरन्त अपना जादुई कालीन बिछा दिया, और तीनों भाई एक दूसरे को पकड़कर उस पर बैठ गये । कालीन बादलों में उड़ चला और पलक झपकते खानजादी के खुले मजार के पास जा उतरा । भीड़ एक ओर हट गयी । खान ने डबडबाई आँखों से आकाश से अचानक उतरे तीन नौजवानों की ओर देखा, लेकिन समझ न सका कि क्या हो रहा है । उधर छोटा भाई मृत सुन्दरी के पास लपककर पहुंचा और सोने की कंघी उसके बालों में फेरने लगा ।

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Thursday, 12 September 2013

रूपवती अयस्लु

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मझला भाई बीच के रास्ते से सीधा आगे बढता गया । वह भी कुछ समय बाद एक अनजाने नगर में पहुँचा । बाज़ार में , जहाँ विदेशी व्यापारी माल बेच रहे थे, उसकी नजर एक चमकीले रंगों और विचित्र बेलबूटोंवाले कालीन पर पड़ गयी ।

"यह कालीन कितने का है ?" उसने दुकानदार से पूछा ।
"पांच सौ अशर्फियों का, और इसका रहस्य भी इतने का ही है ।"
"तुम कौन से रहस्य की बात कर रहे हो ?"
"अरे, यह जादुई कालीन है ! यह पलक झपकते ही आदमी को दुनिया में कहीं भी पहुँचा सकता है ।"

युवक ने विक्रेता को अपने सारे पैसे दे दिये और कालीन को लपेटकर ख़ुशी-ख़ुशी शहर से रवाना हो गया ।

छोटा भाई तिराहे पर बायीं ओर मुड़ा । वह भी उस रस्ते से एक विदेशी नगर में पहुँच गया । वह काफी देर तक गलियों में भटकता रहा, सारी दुकानों में झांकता रहा, पर उसे अपनी प्रियतमा के योग्य वस्तु कहीं नहीं मिली । लेकिन जब वह पूर्णतः आशा छोड़ चुका था, दुखी हो गया था, तभी उसकी नजर एक चमचमाती चीज पर पड़ गयी ।

"यह क्या है ।" युवक ने पूछा ।

दुकानदार ने उसे हीरे-जवाहरात जड़ी सोने की कंघी दी । युवक की आंखे चमक उठीं ।

"कंघी की क्या कीमत चाहते हो ?"

दुकानदार हंसा और बोला , "चलो, यहाँ से दफा हो जाओ ! ऐसी चीज खरीदना तुम्हारे बूते के बाहर है ! यह कंघी एक हजार अशर्फियों की है और दो हजार अशर्फियाँ है इसके रहस्य की कीमत ।"

"आखिर इस कंघी का ऐसा क्या राज है, जो तुम उसकी इतनी कीमत लगा रहे हो ?"

बूढ़े ने उत्तर दिया, "अगर इस कंघी से किसी बीमार के बालों में कंघी की जाय, तो वह ठीक हो जाएगा, और अगर मुर्दे के बालों में कंघी की जाए, तो वह जी उठेगा ।"

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Tuesday, 10 September 2013

रूपवती अयस्लु

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भाइयों ने उसे झुककर प्रणाम किया और यह जाने बिना फिर यात्रा पर निकल पड़े कि खान की बेटी को उनमें से सबसे छोटे से प्रेम हो गया है । उसका प्रेम इतना महान था कि उस दिन और उसी समय से वह निस्तेज होने लगी, सूखने लगी, मानो उसे कोई गम्भीर रोग लग गया हो, कुछ दिनों बाद वह बिल्कुल भी उठने लायक नहीं रह गई और उसने अपने सगे पिता तक को पहचानना बंद कर दिया । खान निराशा में डूब गया । उसने अपनी बेटी का इलाज करनेवाले को एक हजार ऊँट देने का लालच देकर सारी  दुनिया से हकीमों और ओझों को बुलवा लिया । महल हकीमों और ओझों से पूरा भर गया, लेकिन खान की रूपवती बेटी का स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन बिगड़ता ही गया ।

उस समय तीनों भाई राजधानी से बहुत दूर जा चुके थे । वह एक ही रास्ते पर कई दिनों तक चलते रहे , फिर उनके रास्ते अलग-अलग हो गये ओए वह तीस दिन बाद उसी स्थान पर मिलने का वादा करके अलग-अलग दिशाओं में चल पड़े ।

बड़ा भाई बाईं ओर मुड़ा और कुछ समय बाद एक बड़े शहर में पहुँचा । सभी दुकानों में झांकने के बाद उसे एक सोने के चौखटेवाला  अतिसुन्दर कारीगरी का दर्पण दिखाई दे गया ।

"यह शीशा कितने का है ?" युवक ने पूछा ।

"शीशा सौ अशफियों का है, पर इसका रहस्य-पांच सौ का ।"

"आखिर इसका रहस्य क्या है ?"

"यह शीशा ऐसा है कि अगर सुबह में इसमें देखा जाय, तो दुनिया के देश, शहर, गांव और चारागाह नजर आ जायेंगे ।"

"ऐसी ही चीज की जरुरत है मुझे !" युवक ने मन में सोचा । उसने बिना सोचे विचारे रकम गिन दी और शीशे को अपनी सीने में छुपाकर पूर्वनिश्चित स्थान की और चल दिया ।

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Monday, 9 September 2013

रूपवती अयस्लु

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मझला भाई बोला, "हम चिट्ठी निकाल लेते हैं कि रूपवती के पास कौन जाये, इसका फैसला हमारी किस्मत ही करे ।"

छोटे भाई ने कहा, "भाइयों, हमने शिला-पट साथ ही ढूंढा है इसलिए चलो हम साथ ही रूपवती को ढूंढने चलें और यदि हमें उसे अपनी आँखों से देखने का सौभाग्य मिला तो फिर उसे ही हम तीनों में से किसी को अपना पति चुन लेने देंगे ।"

तीनों ने यही फैसला किया । उन्होंने शिला-पट उठाया, लेकिन उसके नीचे एक और अदभुत वस्तु मिली एक चमड़े के थैले में बहुमूल्य खजाना था - तीन हजार पुरानी अशर्फियां । उन्होंने धन बराबर-बराबर बांट लिया और वह रूपवती अयस्लु की खोज में निकल पड़े ।

उन्होंने जंगल का कोना-कोना छान मारा लेकिन उन्हें अयस्लु कहीं नहीं मिली, जिसका चित्र शिला-पट पर था । अन्त में तीनों भाई खान की राजधानी में पहुँचे । वहाँ उन्हें एक वृदा मिली । युवकों ने उसे शिला-पट दिखा कर पूछा कि क्या वह जानती है कि सुंदरी, जिसका चित्र पत्थर पर अंकित है, किस देश में है ।

"मुझे क्यों न पता होगा"  स्त्री ने कहा "यह हमारे खान की बेटी है । इसका नाम अयस्लु है । दुनिया में उसके जैसे रूप और गुणोंवाली और कोई लड़की नहीं है ।"

लम्बी राह की थकान और कठिनाईयों को भुलाकर तीनों भाई तुरन्त खान के महल की ओर रवाना हो गये । पहरेदारों ने शिला-पट पर लिखा आलेख पढ़ कर उन्हें तुरन्त खान की बेटी के कक्ष में जाने दिया ।

जीती-जागती अयस्लु को देखकर तीनों भाई हैरान रह गये । उसका नाम चन्द्रमा पर ही रखा गया था और खुद वह सूरज की भांति चमक रही थी । "आप कौन हैं ?" अयस्लु ने पूछा । "आपका किस काम से मेरे पास आना हुआ है ?" बड़े भाई ने सबकी ओर से उत्तर दिया । "सुंदरी, जंगल में शिकार करते समय हमें एक शिला=-पट मिला, जिस पर आपका चित्र अंकित था और हम आधी दुनिया पार करके उसे आपके पास लाये हैं । अपना वादा पूरा कीजिये, अयस्लु ! हममें से किसी एक को अपना पति चुन लीजिये ।"

सुन्दरी बहुमूल्य कालीन से उठी और भाइयों के पास आकर बोली । "बहादुर नौजवानों, मैं अपने वादे से मुकरती नहीं हूँ । पर आप तीन हैं और मेरी नज़रों में तीनों बराबर हैं, लेकिन आप में से किसको चुनना न्यायपूर्ण होगा ? आप में से किसे सर्वश्रेष्ठ मानूँ ? मैं आपके प्रेम की परीक्षा लेना चाहती हूँ । मैं आप में से उसी को अपना पति चुनूंगी , जो एक महीने की अवधि में मुझे दुर्लभ से दुर्लभ उपहार लाकर देगा ? क्या आपको यह शर्त मंजूर है ? "

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