Saturday, 9 February 2013

सुरपदम कैसे बना मयूर

     असुरों के राज्य में सुरपदम नाम का असुर रहता था। सुरपदम अत्यंत अत्याचारी था, क्योंकि उसे भगवान शिव से वरदान प्राप्त था कि भगवान शिव के पुत्र के अलावा अन्य कोई उसे मार नहीं सकेगा। भगवान शिव ने जब उसे यह वरदान दिया, उसके कुछ ही समय पश्चात उनकी प्रिय पत्नी 'सती' की मृत्यु हो गई। उस समय सारे देवता शोक के सागर में डूब गए, जबकि सुरपदम और उसके साथी दुष्ट असुर प्रसन्न थे। उन्हें विशवास हो गया था कि अब भगवान शिव का पुत्र कभी नहीं होगा। इसलिए उन्होंने स्वर्ग में, जहां देवराज इन्द्र राज्य करते थे, उपद्रव करना शुरू कर दिया। जिससे वहां अव्यवस्था और अशांति उत्पन्न हो गई। असुरों ने स्वर्गलोक पर आक्रमण कर दिया और इन्द्र तथा अन्य देवताओं को कैद कर लिया। इन्द्र के घोड़े उच्चै:श्रवा को भी छीन लिया। इन्द्र और अन्य देवता बहुत भयभीत हो गए। सुरपदम और असुरों द्वारा सताए जाने लगे। देवताओं को अपने कोई भी कार्य करने की अनुमति नहीं थी। सूर्य को कहा गया कि वह दिन में नहीं निकलेगा और चंद्रमा को आदेश था कि वह रात में नहीं निकल सकता है।

देवताओं ने असुरों को हरा कर स्वर्गलोक से निकालने के लिए उनसे युद्व किया, लेकिन वे हार गए, क्योंकि असुरों को सुरपदम का नेतृत्व प्राप्त था। जो भगवान शिव के वरदान के कारण सुरक्षित था। जब देवता असुरों से बहुत अधिक परेशान हो गए तब वह एकत्रित होकर ब्रह्मा जी के पास गए और उन्हें अपनी व्यथा सुनाई।

देवताओं के मुहं से सारी कथा सुनकर ब्रह्मा जी बोले, "शिव से उत्पन्न पुत्र ही सुरपदम और उसके साथी असुरों को हरा सकता है। इसलिए आप लोगों को भगवान शिव के पास जाकर प्रार्थना करनी चाहिए। देवता उसी समय भगवान शिव से मिलने चल दिए कि वह हमारी सहायता अवश्य करेंगे।लेकिन जब वह कैलाश पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि भगवान शिव तो समाधी में लीन हैं।

निराश होकर देवता फिर से ब्रह्मा जी के पास पहुंचे।

"हमें अब क्या करना चाहिए" सब देवताओं ने दुखी होकर कहा।

ब्रह्माजी ने कहा "तुम सब कामदेव और देवी पार्वती से सहायता के लिए प्रार्थना करो। इनकी सहायता से ही भगवान शिव अपनी समाधि से उठ सकेंगे।"

देवी पार्वती और कामदेव ने देवताओं की प्रार्थना स्वीकार कर ली। कामदेव अपने वाहन तोते पर सवार होकर उस और चल दिए, जहां भगवान शिव समाधि में बैठे थे। कामदेव ने अपने प्रेमरूपी धनुष से पुष्पबाण चला दिया। बाण सीधा भगवान् शिव के ह्यदयस्थल से टकराया, जिससे उनकी समाधि तत्काल भंग हो गई, लेकिन इस तरह ध्यान भंग किये जाने से शिव अत्यंत रुष्ट हो गए। उन्होंने अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया। फिर कुछ समय पश्च्चात भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हो गया और वह प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे। कुछ समय बाद उनके एक पुत्र हुआ जिसका नाम कार्तिकेय रखा गया। कार्तिकेय को बचपन से ही युद्व कलाओं का प्रशिक्षण दिया गया जिससे उनमें वीरता और निर्भयता के लक्षण प्रकट होने लगे। एक दिन भगवान शिव ने कार्तिकेय से कहा  कि अब समय आ गया है कि असुरराज सुरपदम से युद्व किया जाय। कार्तिकेय ने अपने पिता से आशीर्वाद लेकर युद्व के लिए प्रस्थान किया।

सुरपदम और कार्तिकेय के बीच भयंकर युद्व छिड़ गया।सुरपदम ने अपने परशु और गदा से युवा योद्वा पर जोरदार प्रहार किया। कार्तिकेय ने सबको नष्ट कर दिया। सुरपदम ने कार्तिकेय को हराने के लिए वो सभी तरीके अपनाए जिन्हें वह जानता था। लेकिन कार्तिकेय पर कोई असर नहीं हो रहा था। आखिर वह छुपने के लिए एक विशाल वृक्ष बन गया। लेकिन कार्तिकेय को पता चल गया कि वह वृक्ष का रूप धारण किये हुए है। उन्होंने अपनी बरछी उठाई और उसका जोरदार प्रहार किया। वह विशाल वृक्ष दो भागों में फटकर जैसे ही पृथ्वी पर गिरा सुरपदम भयभीत स्वर में अपने प्राणों की भीख मांगने लगा। यह सुनकर कार्तिकेय रुक गए।

कार्तिकेय ने कहा "मैने तुम्हारे पापकर्मों के कारण तुम पर आक्रमण किया लेकिन जिस वीरता से तुमने युद्व किया, उसके लिए मैं तुम्हारे शरीर के दो भागों को 'मुर्गा' और 'मयूर' के रूप में बदल रहा हूँ। मुर्गा मेरी ध्वजा पर मेरे चिन्ह के रूप में शोभा बढ़ाएगा और सुन्दर मयूर के रूप में तुम मेरे वाहन बनोगे। तुम पर सवार होकर मैं पूरे विश्व का भ्रमण करूँगा और तुम सदैव मेरे साथ रहोगे।

इसलिए जब भी आप किसी मंदिर में जायेंगे, जहां कार्तिकेय की पूजा होती है, तो देखेंगे कि एक सुन्दर मयूर उनकी सेवा के लिए हमेशा पीछे खड़ा है वही मयूर जो कभी असुर था।

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Tuesday, 5 February 2013

जब रखोगे, तभी तो उठाओगे

धनीराम नाम का एक व्यक्ति था। वह मेहनत करके अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। वह धीरे-धीरे कामचोर बनता गया और एक दिन नाकारा हो गया। धीरे-धीरे उसने ठगी का काम शुरू कर दिया। उसने पहले जान-पहचान वालों से उधार लेना शुरू कर दिया। जब लोग पैसे वापस मांगते, तो तरह-तरह के बहाने बना देता। जैसे-जैसे उसके जान-पहचान के लोग आपस में मिलते गए, उसकी पोल-पट्टी खुलती गई। सब यही बात करते कि जबसे उसने पैसे लिए हैं, तब से मिलना ही बंद कर दिया है। जब जान-पहचान के लोगों ने पैसे देने बंद कर दिए, तो वह अपने रिश्तेदारों से उधार के नाम पर पैसे ऐंठने लगा। पहले सगे रिश्तेदारों से पैसे लेने शुरू किये। इसके बाद दूर के रिश्तेदारों से पैसे मांगना शुरू कर दिया।

एक दिन वह एक साधु प्रवृति के व्यक्ति के पास गया। उसने बैठाकर पानी पिलाया। फिर उससे पूछा, "तुम धनीराम ही हो न?" उसने हां में सिर हिलाया। फिर पूछा, "कहो, कैसे आना हुआ इतने वर्षों बाद। सब ठीक-ठाक तो है न?" धनीराम ने जवाब देते हुए कहा, "सब ठीक तो है, लेकिन.....। काम नहीं मिल पा रहा है। घर में तंगी आ गई है। अगर कुछ रुपये उधार दे दें, तो हालत संभल जायेगी।" वह व्यक्ति बात करते हुए उठा और सामने आले में पचास रुपए रख आया। जब धनीराम चलने के लिए खड़ा हुआ, तो उस व्यक्ति ने आले की और इशारा करते हुए कहा, "सामने आले में पचास रुपए रखे हुए हैं, ले जाओ। जब हो जाएं, इसी में रख जाना।" उसने आले में से रुपए उठाए और चला गया।

इसी तरह ठगी से वह अपना काम चलाता रहा। किसी ने दोबारा दे दिए, किसी ने नहीं दिए। अब वह बैठा-बैठा गणित लगाता रहता कि कोई छूट तो नहीं गया, जिससे पैसे मांगे जा सकते हैं या किस-किस के पास जाएं। कितना-कितना समय बीत गया जिनके पास दोबारा जाया जा सके। ऐसे लोगों की उसने सूची बनाई, जिनसे पैसे लिए हुए तीन साल हो गए थे। इस सूची के लोगों के पास जाना शुरू कर दिया, लेकिन बहुत कम लोगों ने पैसे दिए। अचानक उसे साधु प्रवृति वाले व्यक्ति की याद आई। सोचा, अब तो वह भूल गया होगा। उसी के पास चलते हैं।

जब धनीराम वहां पहुंचा तो उसने उसे बैठाया। पानी पिलाया और नाश्ता कराया। उस व्यक्ति ने पूछा, "सब ठीक-ठाक तो है।"

धनीराम ने उत्तर देते हुए कहा, "सब ठीक तो है, लेकिन.....।" उसने फिर पूछा, "लेकिन क्या?" धनीराम बोल "बच्चे भूखे हैं। काम भी नहीं मिल रहा है। कुछ पैसे उधार दे देते, तो काम चल जाता।" "ले जाओ उसमें से।" आले की ओर इशारा करते हुए उस व्यक्ति ने कहा।

वह खुश होता हुआ उठा कि यह सच में पिछले पैसे भूल गया है। इसने न पिछले पैसों की चर्चा की और न मांगे ही। सोचते-सोचते वह आले तक आ गया। उसने आले में हाथ डाला तो कुछ नहीं मिला। धनीराम ने उस व्यक्ति की और देखते हुए कहा, "इसमें तो कुछ भी नहीं है?"

इतना सुनकर वह बोला , "जो तुम पैसे ले गए थे, क्या रखकर नहीं गए थे?"

उसके मुंह से कोई उत्तर नहीं निकला। उसने न में सर हिलाते हुए उत्तर दिया। उस साधु प्रवृति वाले व्यक्ति ने सहज रूप से कहा, तब फिर कहाँ से मिलेंगे? 'जब रखोगे, तभी तो उठाओगे'।

वह चुपचाप बाहर आया और अपना-सा मुहं लिए चला गया।


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Thursday, 24 January 2013

हमारी सोच की शक्ति

एक बार गणेश नाम का एक आदमी कहीं जा रहा था। रास्ते में जंगल पड़ा। वह बहुत थक चुका था इसलिये उसने सोचा कि मै थोड़ी देर किसी पेड़ के नीचे आराम कर लेता हूँ। सामने ही उसे एक बहुत बड़ा पेड़ नजर आया। वह उसके नीचे बैठ गया। तभी उसने सोचा बड़ी जोर से भूख लग रही है कितना अच्छा होता कि मुझे डोमिनियो का पीज़ा खाने को मिल जाये। तभी वहां से एक आदमी अपनी स्कूटी पर पीजा लेकर जा रहा था और उसको पीजा खाने को मिल गया। फिर उसने सोचा काश यहां पर पलंग होते तो कितना अच्छा होता मैं उस पर आराम से सो जाता तभी उसने देखा एक ट्रक आकर उसके पास रुका और उसमें पलंग थे वह ट्रक खराब हो गया था। ट्रक वाला पलंग को वहीं रखकर ट्रक ठीक करवाने चला गया। गणेश पलंग पर आराम से लेट गया तभी उसने सोचा काश मुझे कोल्ड ड्रिंक पीने के लिए मिल जाती। अचानक उसका हाथ तकिए के नीचे गया तो उसने देखा तकिये के नीचे एक कोल्ड ड्रिंक की बोतल पड़ी हुई है वह बहुत खुश हो गया। उसने कोल्ड ड्रिंक पी ली। फिर उसने सोचा मैं जंगल में बिलकुल अकेला यहां आराम से लेटा हुआ हूँ कहीं जंगली जानवर या शेर आ गया और मुझे खा गया तो तभी उसे शेर के दहाड़ने की आवाज आयी तो वह बहुत जोर से डर गया। और शेर ने उसको मार दिया। मरने के बाद वह भगवान के पास पहुँचा। उसने भगवान् से पूछा कि मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ तब भगवान ने उसे बताया कि तुम जिस पेड़ के नीचे बैठे थे वो कल्पवृक्ष था। कल्पवृक्ष एक ऐसा पेड़ है जिसके नीचे बैठ कर कोई भी व्यक्ति जो सोचता है वह सच हो जाता है। इसी कारण तुमने उसके नीचे जो जो भी सोचा वह सच हो गया।

सीख : हर व्यक्ति के अन्दर कल्पवृक्ष है। हमारी सोच ही हमारा कल्पवृक्ष है। हम जैसा सोचते हैं वैसी ही घटनाएं, परिस्थितियां और वातावरण हमारे आस-पास बन जाता है। हमारी सोच में इतनी शक्ति है कि चाहे जितनी भी नकारात्मक परिस्थिति हो हम उसे अपनी सकारात्मक सोच से आसानी से बदल सकते हैं। अपना  और दूसरों का जीवन खुशियों से भर सकते हैं।

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Thursday, 17 January 2013

न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी

यह कहानी भगवान श्रीकृष्ण के बचपन की है जब वह बहुत नटखट हुआ करते थे। भगवान् श्रीकृष्ण को बचपन से ही बांसुरी बजाने का बहुत शौक था। ग्वाले रोज गायें चराने जाते थे। श्रीकृष्ण इनके बीच बांसुरी बजाते रहते थे। उनकी बांसुरी की आवाज इतनी सुरीली और मधुर होती थी कि जो भी सुनता था, वह मुग्ध हो जाता था। श्रीकृष्ण के युवावस्था तक पहुँचते-पहुँचते बांसुरी की आवाज जादू का काम करने लगी थी। जो भी आवाज सुनता था, वह बांसुरी की ओर इस तरह खिंचता चला आता था जैसे कोई वस्तु चुम्बक की ओर खिंची चली आती है।

ग्वालों की तरह ग्वालिनें भी बांसुरी सुनने के लिए श्रीकृष्ण के पास पहुंच जाती थीं। शुरू-शुरू में ग्वालिनें घंटे-दो घंटे बांसुरी सुनकर चली जाती थीं। धीरे-धीरे ग्वालिनें बांसुरी सुनने में अधिक समय बिताने लगीं और घर के काम-काज के लिए समय कम रहने लगा। कुछ ग्वालिनें ऐसी भी होती थीं, जो घर के अपने छोटे बच्चों को छोड़कर बांसुरी सुनने श्रीकृष्ण के पास चली जाती थीं।

श्रीकृष्ण अपनी बांसुरी बजाने में डूबे रहते। पूरे गोकुल की ग्वालिनें उनसे प्रेम करने लगी थीं, लेकिन श्रीकृष्ण थे कि अपनी बांसुरी बजाने में डूबे रहते। कभी-कभी बांसुरी की आवाज रात के सन्नाटे को चीरती हुई दूर-दूर गांवों तक जा पहुंचती थी। ग्वालों और ग्वालिनों पर बांसुरी का एक जादू-सा प्रभाव होता और वे बांसुरी सुनने के लिए अपने-अपने घर से निकल पड़ते थे।

गाँवों में बड़ी अव्यवस्था फैल गई। जब घर का काम-काज छोड़कर ग्वालिनें श्रीकृष्ण के पास चली जातीं, तो घर का बचा हुआ काम घर के बड़े लोगों को करना पड़ता। उन्हें छोटे-छोटे बच्चों की भी देखभाल करनी पड़ती। गाँव की सभी लड़कियां लोक-लाज छोड़कर श्रीकृष्ण की बांसुरी सुनने पहुंच जाती थीं। जब श्रीकृष्ण से कहा गया, तो उन्होंने कहा, "मै  तो अपनी बांसुरी बजाने में डूबा रहता हूँ। मैं किसी को बुलाने तो जाता नहीं। आप अपने-अपने परिवार वालों को समझाइए कि वे मेरे घर न आएं।"

ग्वालिनें न तो घर वालों की बात मानती थीं और न किसी बाहर वालों का उन्हें कोई डर था। अब तो एक ही रास्ता रह गया था कि श्रीकृष्ण बांसुरी बजाना बंद करें। गांवों के मुखिया, जमींदार आदि सभी परेशान थे। उन्होंने नंदबाबा को समझाया, इसके बाद भी कोई हल नहीं निकला। गांव के खास-खास लोग राजा के पास गए और उनके सामने यह समस्या रखी। सबकी बात सुनकर राजा ने यह आज्ञा दी कि मेरे राज्य में जितने भी बांस के पेड़ हैं, उनको काट दिया जाय और उनमें आग लगा दी जाय। दूसरे दिन सब बांस के पेड़ों को आग लगा दी गई। तब लोगों ने कहा
'न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी।'

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Wednesday, 24 October 2012

मुसीबत में साहस

एक बार कुछ खरगोश गरमी के दिनों में एक सूखी झाड़ी में इकठ्ठे हुए। खेतों में उन दिनों अन्न न होने की वजह से वे सब भूखे थे और वह भूख से बहुत परेशान थे। इन दिनों सुबह और शाम को गाँव से बाहर घूमने वालों के साथ आने वाले कुत्ते भी उन्हें बहुत तंग करते थे। कुतों के दौड़ने पर खरगोशों को छुपने की कोई जगह भी नहीं मिलती थी। सब खरगोश बहुत परेशान हो गए थे।

 एक खरगोश ने कहा "भगवान ने हमारी जाति के साथ बड़ा अन्याय किया है। हमको इतना छोटा और दुर्बल बनाया।हमें उन्होंने न तो हिरन जैसे सींग दिए और न ही बिल्ली जैसे तेज पंजे। अपने दुश्मन से बचने का हमारे पास कोई उपाय नहीं है। सबके सामने से हमें भागना पड़ता है।"

दूसरे खरगोश ने कहा "मैं तो अब इस दुःख और आशंका से भरे जीवन से घबरा गया हूँ। मैंने तालाब में डूबकर मर जाने का निश्चय किया है।"

तीसरा बोला "मैं भी मर जाना चाहता हूँ। अब और दुःख मुझसे नहीं सहा जाता। मैं अभी तालाब में कूदने जा रहा हूँ।"

"हम सब तुम्हारे साथ चलते हैं। हम सब साथ रहे हैं तो साथ ही मरेंगे।" सब खरगोश बोल उठे। सब एक साथ तालाब की और चल पड़े।"

जब वह तालाब पर पहुंचे तो तालाब के पानी से निकलकर बहुत सारे मेंढक किनारे पर बैठे थे। जब खरगोशों के आने की आवाज उन्हें आयी तो वे जल्दी से पानी में कूद गये। मेंढ़कों को डरकर पानी में कूदते देख खरगोश रुक गए। एक खरगोश बोला "भाइयों! हमें जान देने की कोई जरुरत नहीं है, आओ वापस चलें। जब भगवान की इस दुनिया में हमसे भी छोटे और हमसे भी डरने वाले जीव रहते हैं और जीते हैं, तो हम अपनी जिंदगी से क्यों निराश हों?"

उसकी बात सुनकर खरगोशों ने आत्महत्या का विचार छोड़ दिया और वापस लौट गये।

सीख : जब तुम पर कोई मुसीबत आये और तुम्हे डर लगे तो यह देखो कि दुनिया में कितने ही लोग तुमसे भी ज्यादा दुखी, दरिद्र, रोगी और संकटग्रस्त हैं। तुम उनसे कितनी अच्छी दशा में हो। फिर तुम्हे क्यों घबराना चाहिये।

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Friday, 12 October 2012

नेकी का बदला

एक बार की बात है एक कबूतर पेड़ की डाल पर बैठा था। वो पेड़ नदी के किनारे था। कबूतर ने डालपर बैठे बैठे देखा कि नदी के पानी में एक चींटी बहती जा रही है। वह बेचारी बार बार किनारे आने की कोशिश करती है लेकिन पानी की धारा बहुत तेज है जिससे वो किनारे नहीं आ पा रही है। ऐसा लगता है कि चींटी थोड़ी देर में पानी में डूबकर मर जायेगी। कबूतर को दया आ गयी। उसने अपनी चोंच से एक पत्ता तोड़कर चींटी के पास पानी में गिरा दिया। चींटी उस पत्ते पर चढ़ गयी। पत्ता बहकर किनारे आ गया। इस तरह चींटी की जान बच गयी। चींटी ने मन ही मन कबूतर का धन्यवाद किया।

उसी समय एक बहेलिया वहाँ आया और पेड़ के नीचे छुपकर बैठ गया। कबूतर ने बहेलिये को नहीं देखा। बहेलिया अपना बांस कबूतर को फँसाने के लिए ऊपर बढाने लगा। चींटी ने यह सब देखा तो वो पेड़ की और दौड़ी। वह बोल सकती तो जरूर बोलकर कबूतर को सावधान कर देती लेकिन वह बोल नहीं सकती थी। चींटी ने सोचा कबूतर ने मेरी जान बचायी थी इसलिए मैं भी इसकी जान बचाउंगी। पेड़ के नीचे पहुंचकर चींटी बहेलिये के पैर पर चढ़ गयी और उसने बहेलिये के पैर में पूरे जोर से काटा। चींटी के काटने से बहेलिया हिल गया और उसका बाँस भी हिल गया। जिससे पेड़ के पत्तों की आवाज से कबूतर सावधान होकर उड़ गया। इस तरह से कबूतर को अपनी नेकी का फल मिल गया और उसकी जान बच गयी।

सीख : जो संकट में पड़े लोगों की सहायता करता है, उसपर संकट आनेपर उसकी सहायता भगवान् अवश्य करते हैं।

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Friday, 5 October 2012

झूठ बोलने का फल


एक लड़का था जिसका नाम राजू था। उसको स्कूल जाना बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता था। कभी कभी वो झूठ बोल कर छुट्टी कर लेता था।

एक बार उसने सोचा कि मैं आज स्कूल नहीं जाऊँगा। जब स्कूल का टाइम हुआ तो उसकी माँ ने पूछा "राजू तुम स्कूल के लिए अभी तक तैयार क्यों नहीं हुए हो। चलो जल्दी से तैयार हो जाओ।"

 राजू बोला "माँ आज मैं स्कूल नहीं जाऊँगा।" माँ ने पूछा "क्यों नहीं जाओगे राजू स्कूल।"

राजू बोला "आज मेरे पेट में बहुत जोर से दर्द हो रहा है इसलिए माँ आज में स्कूल नहीं जाऊँगा।"

राजू की माँ समझ गई कि राजू झूठ बोल रहा है। माँ ने कहा "राजू झूठ बोलना बहुत बुरी बात है।" राजू बोला "माँ में झूठ नहीं बोल रहा हूँ सचमुच मेरे पेट में दर्द हो रहा है।" माँ चुप हो गयी। और राजू ने स्कूल की छुट्टी कर ली।

शाम को राजू के पापा ऑफिस से घर आये। वो बहुत अच्छी अच्छी मिठाइयाँ और बहुत सारी चॉकलेट ले कर आये थे। पापा ने आते ही पूछा "राजू आज स्कूल में दिन कैसा रहा?" राजू ने धीरे से कहा "पापा आज मैं स्कूल नहीं गया। मेरे पेट में दर्द हो रहा था।"

पापा ने कहा "अच्छा! मैं तो तुम्हारे लिए मिठाई और चॉकलेट लाया था। पर तुम्हारे तो पेट में दर्द हो रहा है  यह तुम्हे और भी नुकसान करेगी। इसलिए तुम मिठाई और चॉकलेट बिलकुल भी नहीं खाना। अब जाओ  दवाई खाकर सो जाओ।"

राजू के सामने ही पापा ने सबको मिठाई और चॉकलेट बाँट दी। सब मिठाई खाने लगे। सबको मिठाई खाते हुए देख कर राजू का भी मन कर रहा था कि मैं भी सब खा लूं। पर वो किसी को बता नहीं सकता था कि उसने झूठ बोला है उसके पेट में दर्द है। उसने सोचा कि अगर मैंने झूठ न बोला होता तो आज मुझे भी मिठाई मिलती। उस दिन से उसने झूठ बोलना छोड़ दिया। और वो रोज स्कूल जाने लगा।

सीख : कभी भी हमें किसी से झूठ नहीं बोलना चाहिए उससे हम अपना ही नुकसान कर लेते है।

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Thursday, 4 October 2012

भक्त प्रहलाद और भगवान


बहुत पहले की बात है। हिरण्यकश्यप नाम का एक राजा राज करता था। उसे अपनी ताकत का बड़ा अभिमान था। वह अपने से ज्यादा शक्तिशाली किसी को नहीं समझता था। वह कहता था कि दुनिया की कोई ताकत मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती है। वह मरने से भी नहीं डरता था। क्योकि उसने एक बार बहुत तपस्या की जिससे प्रसन्न हो कर ब्रह्माजी ने उससे कहा , "मैं तुम्हारी तपस्या से बहुत खुश हूँ। मांगो तुम्हे क्या वरदान चाहिए।" हिरण्यकश्यप  ने कहा, "अगर आप मुझ से प्रसन्न हैं तो मुझे बस एक ही वरदान चाहिए कि मेरी मृत्यु न हो। मैं हमेशा के लिए अमर हो जाऊ।"

ब्रह्माजी ने कहा, "ऐसा सम्भव नहीं है क्योकि मृत्यु सभी की आती है उसे रोका नहीं जा सकता है।"

तब हिरण्यकश्यप ने ब्रह्माजी से यह वरदान माँगा, "मुझे न कोई अस्त्र से मार सके न कोई शस्त्र से, न मनुष्य मार सके न जानवर, न धरती पर न आसमान में, न दिन में न रात में, न कोई घर के अन्दर मार सके न कोई घर के बाहर।" ब्रह्माजी ने कहा "तथास्तु!"

हिरण्यकश्यप का एक बेटा था। उसका नाम प्रहलाद था। जब प्रहलाद कुछ बड़ा हुआ तो उसने प्रहलाद को पढ़ने  के लिए गुरु के पास भेजा। प्रहलाद बहुत ही होनहार और बुद्विमान था। इसलिए गुरु उसे बड़े प्यार से पढ़ाते थे। पढ़ते-पढ़ते जब कुछ दिन बीत गए तो हिरण्यकश्यप ने सोचा, देखना चाहिए कि प्रहलाद की पढ़ाई कैसी चल रही है। हिरण्यकश्यप ने उसे गुरु के साथ अपने पास बुलाया और प्रहलाद से पूछा, "दुनिया में सबसे ज्यादा शक्तिशाली कौन है?" उसे आशा थी कि वह कहेगा, "आप!" पर प्रहलाद ने कहा "भगवान जो सबको बनाता है।"

हिरण्यकश्यप को बहुत गुस्सा आया। उसने प्रहलाद से कहा, "कहाँ है तेरा भगवान! क्या तूने उसे देखा है?"

प्रहलाद ने कहा, "देखा तो नहीं। पर ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ भगवान नहीं है।"

हिरण्यकश्यप ने कहा, "तो क्या वह यहाँ भी है।" प्रहलाद ने कहा, "हाँ! भगवान दुनिया की हर चीज में हर समय मौजूद रहता है।"

हिरण्यकश्यप ने गुस्से में आकर और कोई चीज सामने न पाकर बरामदे के खम्भे की और इशारा करके पूछा, "तो क्या तुम्हारा भगवान इस खम्भे में भी है?"

प्रहलाद ने कहा, "हाँ!"

हिरण्यकश्यप प्रहलाद की इस 'हाँ' को सुनकर बहुत गुस्सा हो गया और आपे से बाहर हो गया। उसने खड़े होकर अपनी पूरी ताकत से दोनों हाथों से खम्भे को धक्का मारा और बोला, "दिखा कहाँ है इसमें तेरा भगवान?"
खम्भे के दो टुकड़े हो गए जिसमे से भगवान नरसिंह प्रकट हुए। जिनका शरीर आधा मनुष्य का था और आधा सिंह जैसा।

भगवान नरसिंह ने अपने बड़े बड़े नाखूनों से हिरण्यकश्यप का वध कर दिया। जिस समय नरसिंह भगवान ने हिरण्यकश्यप का वध किया उस समय न दिन था न रात थी शाम का समय था। न वह घर के अन्दर था न वह घर के बाहर था दरवाजे के बीच में था। न धरती पर था न आकाश में वह उनकी गोद में था। न वह अस्त्र से मरा न शस्त्र से उसे उन्होंने अपने तेज नाखूनों से मारा। न उसे मनुष्य ने मारा न जानवर ने क्योकि नरसिंह भगवान् का शरीर आधा मनुष्य का था और आधा जानवर का। इस तरह ब्रह्माजी का दिया हुआ वरदान पूरा हुआ। 

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Monday, 1 October 2012

पृथ्वी का चक्कर


भगवान् शिव और माता पार्वती के दो पुत्र थे। कार्तिकेय और गणेश। दोनों देखने में लगभग एक ही उम्र के लगते थे।जब वह बड़े होकर विवाह के योग्य हुए तो शिव-पार्वती के सामने यह प्रश्न था कि दोनों में से पहले किसकी शादी की जाय। उन्होंने एक दिन दोनों को अपने पास बुलाकर कहा, "तुम दोनों अब बड़े हो गए हो। तुम्हें अब विवाह करके अपना-अपना घर बसाना चाहिए। इसके लिए संसार के ज्ञान की जरुरत होती है। इसलिए तुम दोनों जाओ और पृथ्वी का चक्कर लगाकर आओ। तुममें से जो पहले आएगा उसी का विवाह हम पहले कर देंगे और जो बाद में आएगा उसका बाद में।"

कार्तिकेय यह सुनते ही पृथ्वी का चक्कर लगाने के लिए चल पड़े। गणेश थोड़ी देर तक सोचते रहे। फिर वो उठे और शिव-पार्वती के चारों और एक चक्कर लगाया और उनके सामने आकर बैठ गए। शिव-पार्वती ने पूछा, "गणेश! तुमने ये क्या किया? तुम अभी तक गए क्यों नहीं पृथ्वी का चक्कर लगाने के लिए।"

गणेश बोले, "आपने संसार का ज्ञान प्राप्त करने के लिए ही तो पृथ्वी का चक्कर लगाने के लिए कहा था। मेरे लिए आप दोनों ही मेरा संसार हैं तो मुझे पृथ्वी का चक्कर लगाने की क्या आवयश्कता है।"

शिव-पार्वती गणेश की कुशाग्र बुद्वि को देखकर दंग रह गए। उन्होंने गणेश का विवाह दक्ष प्रजापति की पुत्री 'बुद्वि' से कर दिया। बुद्वि से उनके दो पुत्र हुए। जिनके नाम शुभ और लाभ रखे गए।

कार्तिकेय जब पृथ्वी का चक्कर लगाकर आये तो वह मन ही मन बहुत खुश हो रहे थे कि गणेश तो अभी तक वापस नहीं आये होंगे। इसलिए उनका विवाह पहले हो जाएगा। जब उन्हें पता चला कि गणेश का विवाह हो गया है और उनके दो पुत्र भी हैं तो उन्हें बहुत बुरा लगा। उन्हें यह लगा कि उनके माता-पिता ने उनके साथ बड़ा अन्याय किया है और बहाना करके उन्हें घर से दूर भेज दिया था। इसलिए उन्होंने विवाह न करने की कसम खाली और कभी विवाह नहीं किया।

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Friday, 28 September 2012

लालची बन्दर


एक बन्दर एक आदमी के घर रोज आता था और रोज कोई न कोई नुकसान कर के जाता था। वह कभी कपड़े फाड़ देता, कभी कोई बर्तन उठा कर ले जाता और कभी बच्चों को काट लेता था। बन्दर से उस घर के लोग बहुत परेशान हो गए थे।

एक दिन घर के मालिक ने कहा, "मैं इस बन्दर को पकड़कर बाहर भेज दूँगा।" उसने एक छोटे मुँह की हाँडी मँगवाई और उसमें थोड़े से चने डालकर रख दिये। बस उस हाँडी का मुँह खुला छोड़ दिया और सब लोग वहाँ से दूर चले गए।

वह बन्दर घर में आया। थोड़ी देर इधर-उधर कूदता रहा। जब उसने हाँडी में पड़े हुए चने देखे तो हाँडी के पास आकर बैठ गया। चने निकालने के लिए उसने हाँडी में हाथ डाला और मुट्ठी में चने भर लिए। हाँडी का मुँह छोटा था। उसमें से बँधी मुट्ठी नहीं निकल सकती थी। बन्दर मुट्ठी निकालने के लिए जोर लगाने और कूदने लगा। वह जोर जोर से चिल्लाया और उछला, लेकिन लालच की वजह से उसने चने नहीं छोड़े।

बन्दर को घर के मालिक ने रस्सी से बाँध लिया और बाहर भेज दिया। अपने लालच की वजह से बन्दर पकड़ा गया। इसीलिये कहते हैं लालच बुरी बला है।

सीख : कभी भी लालच नहीं करना चाहिए। लालच करने से हम अपना ही नुकसान कर लेते हैं।

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