सुरपदम कैसे बना मयूर

     
असुरों के राज्य में सुरपदम नाम का असुर रहता था। सुरपदम अत्यंत अत्याचारी था, क्योंकि उसे भगवान शिव से वरदान प्राप्त था कि भगवान शिव के पुत्र के अलावा अन्य कोई उसे मार नहीं सकेगा। भगवान शिव ने जब उसे यह वरदान दिया, उसके कुछ ही समय पश्चात उनकी प्रिय पत्नी 'सती' की मृत्यु हो गई। उस समय सारे देवता शोक के सागर में डूब गए, जबकि सुरपदम और उसके साथी दुष्ट असुर प्रसन्न थे। उन्हें विशवास हो गया था कि अब भगवान शिव का पुत्र कभी नहीं होगा। इसलिए उन्होंने स्वर्ग में, जहां देवराज इन्द्र राज्य करते थे, उपद्रव करना शुरू कर दिया। जिससे वहां अव्यवस्था और अशांति उत्पन्न हो गई। असुरों ने स्वर्गलोक पर आक्रमण कर दिया और इन्द्र तथा अन्य देवताओं को कैद कर लिया। इन्द्र के घोड़े उच्चै:श्रवा को भी छीन लिया। इन्द्र और अन्य देवता बहुत भयभीत हो गए। सुरपदम और असुरों द्वारा सताए जाने लगे। देवताओं को अपने कोई भी कार्य करने की अनुमति नहीं थी। सूर्य को कहा गया कि वह दिन में नहीं निकलेगा और चंद्रमा को आदेश था कि वह रात में नहीं निकल सकता है।

देवताओं ने असुरों को हरा कर स्वर्गलोक से निकालने के लिए उनसे युद्व किया, लेकिन वे हार गए, क्योंकि असुरों को सुरपदम का नेतृत्व प्राप्त था। जो भगवान शिव के वरदान के कारण सुरक्षित था। जब देवता असुरों से बहुत अधिक परेशान हो गए तब वह एकत्रित होकर ब्रह्मा जी के पास गए और उन्हें अपनी व्यथा सुनाई।

देवताओं के मुहं से सारी कथा सुनकर ब्रह्मा जी बोले, "शिव से उत्पन्न पुत्र ही सुरपदम और उसके साथी असुरों को हरा सकता है। इसलिए आप लोगों को भगवान शिव के पास जाकर प्रार्थना करनी चाहिए। देवता उसी समय भगवान शिव से मिलने चल दिए कि वह हमारी सहायता अवश्य करेंगे।लेकिन जब वह कैलाश पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि भगवान शिव तो समाधी में लीन हैं।

निराश होकर देवता फिर से ब्रह्मा जी के पास पहुंचे।

"हमें अब क्या करना चाहिए" सब देवताओं ने दुखी होकर कहा।

ब्रह्माजी ने कहा "तुम सब कामदेव और देवी पार्वती से सहायता के लिए प्रार्थना करो। इनकी सहायता से ही भगवान शिव अपनी समाधि से उठ सकेंगे।"

देवी पार्वती और कामदेव ने देवताओं की प्रार्थना स्वीकार कर ली। कामदेव अपने वाहन तोते पर सवार होकर उस और चल दिए, जहां भगवान शिव समाधि में बैठे थे। कामदेव ने अपने प्रेमरूपी धनुष से पुष्पबाण चला दिया। बाण सीधा भगवान् शिव के ह्यदयस्थल से टकराया, जिससे उनकी समाधि तत्काल भंग हो गई, लेकिन इस तरह ध्यान भंग किये जाने से शिव अत्यंत रुष्ट हो गए। उन्होंने अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया। फिर कुछ समय पश्च्चात भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हो गया और वह प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे। कुछ समय बाद उनके एक पुत्र हुआ जिसका नाम कार्तिकेय रखा गया। कार्तिकेय को बचपन से ही युद्व कलाओं का प्रशिक्षण दिया गया जिससे उनमें वीरता और निर्भयता के लक्षण प्रकट होने लगे। एक दिन भगवान शिव ने कार्तिकेय से कहा  कि अब समय आ गया है कि असुरराज सुरपदम से युद्व किया जाय। कार्तिकेय ने अपने पिता से आशीर्वाद लेकर युद्व के लिए प्रस्थान किया।

सुरपदम और कार्तिकेय के बीच भयंकर युद्व छिड़ गया।सुरपदम ने अपने परशु और गदा से युवा योद्वा पर जोरदार प्रहार किया। कार्तिकेय ने सबको नष्ट कर दिया। सुरपदम ने कार्तिकेय को हराने के लिए वो सभी तरीके अपनाए जिन्हें वह जानता था। लेकिन कार्तिकेय पर कोई असर नहीं हो रहा था। आखिर वह छुपने के लिए एक विशाल वृक्ष बन गया। लेकिन कार्तिकेय को पता चल गया कि वह वृक्ष का रूप धारण किये हुए है। उन्होंने अपनी बरछी उठाई और उसका जोरदार प्रहार किया। वह विशाल वृक्ष दो भागों में फटकर जैसे ही पृथ्वी पर गिरा सुरपदम भयभीत स्वर में अपने प्राणों की भीख मांगने लगा। यह सुनकर कार्तिकेय रुक गए।

कार्तिकेय ने कहा "मैने तुम्हारे पापकर्मों के कारण तुम पर आक्रमण किया लेकिन जिस वीरता से तुमने युद्व किया, उसके लिए मैं तुम्हारे शरीर के दो भागों को 'मुर्गा' और 'मयूर' के रूप में बदल रहा हूँ। मुर्गा मेरी ध्वजा पर मेरे चिन्ह के रूप में शोभा बढ़ाएगा और सुन्दर मयूर के रूप में तुम मेरे वाहन बनोगे। तुम पर सवार होकर मैं पूरे विश्व का भ्रमण करूँगा और तुम सदैव मेरे साथ रहोगे।

इसलिए जब भी आप किसी मंदिर में जायेंगे, जहां कार्तिकेय की पूजा होती है, तो देखेंगे कि एक सुन्दर मयूर उनकी सेवा के लिए हमेशा पीछे खड़ा है वही मयूर जो कभी असुर था।

sakshi kapoor

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